कब तक नकारू इन जज़्बात को,
छुपाए फिरती हूँ अपने हालात को।
जी भर के देख भी ना पाऊँ तुझे,
डर है कि तू ना पढ़ ले,
मेरी आँखों में छिपी उस बात को।
ये छूना तेरी कोहनी का, साथ चलते चलते
और मिलना मुझे हर मोड पर ।
तेरी कहानी का में किस्सा भी नहीं
पर ये टकराना, दे जाता है मुझे,
हमारे साथ होने का ख़्वाब हर रात को।
ये कशिश तेरी मुस्कान की है
या तेरे जुनून होने का सबूत,
कौन मानेगा तेरी हर शर्त
पाने बस तेरी एक मुलाकात को।
कब तक नकारू इन जज़्बात को...
कब तक नकारू इन जज़्बात को....
Comments
Post a Comment