आज जब खोली थी महीनों से बंद खिड़कियां,
कुछ रेत थी हमारी यादों पर जमी हुई।
झांका जब उस यादों के झरोखे से बाहर,
इस सड़क पे तेरा हाथ पकड़े, मैं थी खड़ी हुई।
थाम के यूँ हाथ मेरा ,कुछ कहे अनकहे वादों के साथ,
मेरी नादानियों ओर बेबाकियों को घर मिला तुझ में ही।
कुछ इरादे बांध कर टूटे,
कुछ उम्मीदें थीं, जो पूरी भी हुई।
जब न भरोसा था मुझे खुद पे ओर खुदा पे भी,
तब तेरे कदम पड़े मेरी सरज़मीं पर...जैसे सब मुरादें पूरी हुई।
मैं शोरगुल से भरा एक झरना,
तू वो झील जिसमे मैं हूँ मिलती ।
कि हर रोज बढ़ती जा रही है ...इस रिश्ते की गहराई,
शायद हमको नही कुछ ख़बर नही और तुम को भी कुछ पता नहीं।
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