आज जो ये बाल उड़ते जा रहे है
चेहरा छुपा ,मुझे सताना चाह रहे है।
ना नजरें चुराओ तुम यूं फिर से,
हम फुर्सत से तुम्हे मानना चाह रहे है।
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गर होते हम पंछी
तो क्या अपने परों से खुद को छुपाती?
तो हम भी भीगा कर कुछ पर अपने,
तुम्हारे पास उड़ ,तुमको भिगाना चाह रहे है।
ना नजरें चुराओ तुम यूं फिर से,
हम फुर्सत से तुम्हे मनाना चाह रहे है ।
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ज़रा ढूंढो तो कुछ अपने सामान में तुम,
ये कान चूड़ी की खनक याद रखना चाहते है।
तरसती है ज़मी तुम्हारे आंचल के छूवन को,
हर कोना तुम्हारी खुशबू में महकना चाहता है।
ना नजरें चुराओ तुम यूं फिर से,
हम फुर्सत से तुम्हे मनाना चाह रहे है ।
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